लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रदेश के सूचना विभाग, पुलिस वेरिफिकेशन प्रणाली और अति-संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। ‘भारत समाचार’ से जुड़े और उत्तर प्रदेश शासन से ‘राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त’ पत्रकार सीमाब नक़वी को न्यायालय ने 17 साल पुराने हत्या के एक सनसनीखेज मामले (मुअसं-219/2009) में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
इस सजा के बाद पत्रकार अभिषेक मिश्रा ने शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े प्रहार करते हुए कई चुभते सवाल खड़े किए हैं, जो सीधे तौर पर CM Office UP और लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट की जवाबदेही तय करते हैं।
अभिषेक मिश्रा का तीखा प्रहार:
“लापरवाही की हद्द पार!”
पत्रकार अभिषेक मिश्रा ने इस मामले को उजागर करते हुए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है। उनके द्वारा उठाए गए मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
शातिर अपराधियों को मान्यता कैसे?: अभिषेक मिश्रा ने सवाल किया कि जिस व्यक्ति पर 2009 से हत्या जैसा संगीन मुकदमा चल रहा था, उसे सूचना विभाग (Info Dept UP) ने ‘मान्यता प्राप्त पत्रकार’ का दर्जा कैसे दे दिया? क्या एलआईयू (LIU) और पुलिस वेरिफिकेशन केवल कागजों तक सीमित था?
CM Office की सुरक्षा में सेंध?: मान्यता प्राप्त पत्रकारों को मुख्यमंत्री कार्यालय (पंचम तल), विधानसभा और अन्य हाई-प्रोफाइल सरकारी कार्यक्रमों में बिना रोक-टोक प्रवेश मिलता है। अभिषेक मिश्रा ने पूछा है कि क्या एक हत्यारोपी का इन जगहों पर मौजूद रहना VVIP सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा नहीं था?
माननीयों का साक्षात्कार: सजायाफ्ता अपराधी पत्रकारिता का चोला ओढ़कर प्रदेश के कद्दावर मंत्रियों और शासन के ‘माननीयों’ का साक्षात्कार करता रहा। क्या सुरक्षा एजेंसियों को इतने वर्षों में उसके आपराधिक इतिहास की भनक तक नहीं लगी?
सूचना विभाग और लखनऊ कमिश्नर की भूमिका पर सवाल
उत्तर प्रदेश प्रेस मान्यता नियमावली के अनुसार, किसी भी पत्रकार को कार्ड जारी करने से पहले उसके चरित्र और आपराधिक रिकॉर्ड की गहन जांच अनिवार्य है।
वेरिफिकेशन में चूक: यदि मुकदमा 2009 का था, तो पिछले 15-17 वर्षों में हर साल होने वाले नवीनीकरण (Renewal) के दौरान पुलिस ने ‘क्लीन चिट’ कैसे दी?
प्रशासनिक लापरवाही: लखनऊ कमिश्नर और सूचना विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लग गया है। क्या विभाग के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है जो दागी चेहरों को सिस्टम से बाहर रख सके?
पत्रकारिता की शुचिता पर धब्बा
अभिषेक मिश्रा का मानना है कि ऐसे तत्वों को प्रश्रय मिलना उन हजारों ईमानदार पत्रकारों का अपमान है जो दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। एक अपराधी का सत्ता के गलियारों में रसूख होना न केवल लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कलंकित करता है, बल्कि सरकारी तंत्र की साख को भी मिट्टी में मिलाता है।
आगे की मांग
इस खुलासे के बाद अब शासन स्तर पर निम्नलिखित मांगों ने जोर पकड़ लिया है:
दोषी पत्रकार की मान्यता तत्काल प्रभाव से रद्द की जाए।
उन पुलिस कर्मियों और सूचना विभाग के बाबुओं की जांच हो जिन्होंने गलत वेरिफिकेशन रिपोर्ट लगाकर उसे मान्यता दिलाई।
भविष्य में मान्यता के लिए डिजिटल क्राइम रिकॉर्ड्स और शपथ पत्र को अनिवार्य बनाया जाए।
निष्कर्ष: अभिषेक मिश्रा द्वारा उठाए गए ये सवाल केवल एक पत्रकार की व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ हैं। अब देखना यह है कि योगी सरकार इस भारी लापरवाही पर क्या कड़ा कदम उठाती है।
https://x.com/POLYMISHRA/status/2024857341620064707?s=20






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