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UNI का ‘काला कानून’: रिपोर्टर के पैरों में मैनेजमेंट की बेड़ियाँ,संपादक की सत्ता छीनकर HR ने संभाली कमान

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नई दिल्ली: देश की ऐतिहासिक न्यूज़ एजेंसी ‘यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया’ (UNI) आज अपने गौरवशाली इतिहास के सबसे काले दौर से गुजर रही है। आरपी गुप्ता और विनीत गुप्ता के नए प्रबंधन ने संस्थान का ‘रंग-रोगन’ तो किया, लेकिन भीतर की कार्यसंस्कृति को किसी ‘यातना गृह’ जैसा बना दिया है। यहाँ पत्रकारिता के सिद्धांतों की बलि दी जा रही है और श्रम कानूनों (Labor Laws) की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

​श्रम कानूनों का ‘कत्लेआम’: 8 छुट्टियाँ और 8 घंटे की कैद

​संस्थान में लागू ‘तुगलकी फरमानों’ ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को बंधुआ मज़दूरी के केंद्र में बदल दिया है। श्रम कानूनों के विपरीत, यहाँ पत्रकारों को साल भर में मात्र 8 छुट्टियाँ दी जा रही हैं। हद तो तब हो गई जब प्रबंधन ने ‘8 घंटे के लॉक-इन’ का फरमान सुना दिया।
​अब UNI में प्रवेश करने के बाद संपादक से लेकर उप-संपादक तक, किसी को भी 8 घंटे से पहले बाहर निकलने की अनुमति नहीं है। यह न केवल पेशेवर मर्यादा के खिलाफ है, बल्कि कर्मचारी अधिकारों का भी सीधा उल्लंघन है।

लाचार संपादक: HR और मैनेजमेंट के ‘रबर स्टैंप’

​संपादकीय स्वायत्तता इस कदर खत्म हो चुकी है कि संपादक अब अपने रिपोर्टर को फील्ड में भेजने का अधिकार भी खो चुके हैं। किसी भी न्यूज़ असाइनमेंट पर जाने के लिए रिपोर्टर को HR और मैनेजमेंट से लिखित अनुमति लेनी पड़ती है। न्यूज़ रूम अब न्यूज़ सेंस से नहीं, बल्कि ‘कॉर्पोरेट चाटुकारों’ की लॉबी के इशारे पर चल रहा है।

‘हायर एंड फायर’ का क्रूर खेल: थोक में छंटनी

​श्रम कानूनों को ताक पर रखकर संस्थान में पत्रकारों का ‘नरसंहार’ जारी है। हाल के उदाहरण चौंकाने वाले हैं:
​ABP न्यूज़ से आए एक वरिष्ठ संपादक और उनकी 14 सदस्यीय टीम को सिर्फ 2 महीने में बाहर कर दिया गया।
​सोशल मीडिया टीम के 5 लोगों को महज एक महीने में निकाल दिया गया।
​किसी को न नोटिस दिया गया, न ही बकाया वेतन। ‘बेहतरी’ का लालच देकर अन्य संस्थानों से बुलाए गए पत्रकारों को ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ की नीति का शिकार बनाया जा रहा है।

​चाटुकार लॉबी का वर्चस्व

​संस्थान के भीतर एक ऐसी ‘मठाधीश’ लॉबी सक्रिय है, जिसने प्रबंधन को अपनी मुट्ठी में कर रखा है। अपने निजी स्वार्थों के लिए यह लॉबी नए और काबिल चेहरों को टिकने नहीं दे रही। यूनिवार्ता और उर्दू सेवा, जिन्होंने दशकों तक भारतीय मीडिया को सींचा, आज इसी आंतरिक राजनीति और प्रबंधन की तानाशाही की भेंट चढ़ रही हैं।
​निष्कर्ष: यदि श्रम मंत्रालय और प्रेस काउंसिल ने UNI के इस ‘पिंजरा मॉडल’ पर संज्ञान नहीं लिया, तो 1959 से चली आ रही यह संस्था जल्द ही इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी।

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Author: media4samachar

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